कोटा, राजस्थान के पास स्थित चार चौमा महादेव मंदिर (Char Chouma Mahadev Temple) प्राचीन भारतीय वास्तुकला और गहरी धार्मिक आस्था का एक अद्भुत केंद्र है। यह मंदिर विशेष रूप से अपने दुर्लभ चतुर्मुखी शिवलिंग के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है।
काल: यह मंदिर 6वीं शताब्दी (Gupta Period) का है, जो इसे राजस्थान के सबसे पुराने जीवित मंदिरों में से एक बनाता है।
शैली: मंदिर की वास्तुकला नागर शैली (Nagara Style) का शुरुआती रूप है।
संरक्षण: यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित एक राष्ट्रीय स्मारक है।
इस मंदिर का मुख्य आकर्षण यहाँ का चमकीला काला कसौटी पत्थर से बना शिवलिंग है।
इस शिवलिंग पर चार मुख उकेरे गए हैं, जो शिव के विभिन्न स्वरूपों (सद्योजात, वामदेव, अघोर और तत्पुरुष) को दर्शाते हैं।
स्थानीय मान्यता के अनुसार, इन चार मुखों में ब्रह्मा, विष्णु, शिव और शक्ति (माता पार्वती) का वास माना जाता है।
प्राचीन शिलालेख: मंदिर परिसर में गुप्तकालीन लिपि में दो ब्राह्मी शिलालेख पाए गए हैं।
वास्तुकला: मंदिर में एक गर्भगृह, अंतराल और एक सुंदर सभामंडप है। इसकी छत सपाट और आयताकार है, जो गुप्तकालीन मंदिरों की पहचान है।
बावड़ी: मंदिर के समीप ही एक प्राचीन और सुंदर बावड़ी (Stepwell) स्थित है।
समय: सुबह 5:00 AM से शाम 7:00 PM तक।
स्थान: चार चौमा गाँव, लाडपुरा तहसील, कोटा (कोटा जंक्शन से लगभग 35-39 KM दूर)।
पहुँचने का तरीका: कोटा से टैक्सी या निजी वाहन द्वारा सिमल्या (Simliya) के पास से पहुँचा जा सकता है।
महाशिवरात्रि: यहाँ साल का सबसे बड़ा उत्सव होता है और विशाल मेला भरता है।
सावन मास: पूरे सावन महीने में भक्तों का तांता लगा रहता है।